उत्तराखंड के उत्तरकाशी में कुदरत के कहर से न सिर्फ गाँव के गाँव बर्बाद हुए है बल्कि दुर्गम पहाड़ों में रहने वाले हर परिवार को चेताया है कि प्रकृति के सामने सब लाचार हैं।आराकोट के कई गांव को इस त्रासदी ने कभी न भूलने वाला दर्द दिया है…..हालात कुछ ऐसे हैं कि जिन्होंने अपनी आंखों से बहते सैलाब में ये बर्बादी देखी है वो उस पल को याद कर सिंहर जाते हैं।सब जानते हैं कि पहाड़ में लोगों की दिनचर्या जल्दी शुरू हो जाती है उन दिन भी नार्मल दिनों की तरह लोग अपने अपने घरों से काम निपटाने के लिए सड़कों, रास्तों और बाज़ार में थे…किसे पता था कि चंद मिनटों बाद खूबसूरत वादियों के लिए आज का दिन ब्लैक संडे साबित होने वाला था ।एयर लिफ्ट कर राजधानी देहरादून के दून अस्पताल में ऐसे कई ग्रामीणों को इलाज के लिए शासन ने भर्ती कराया है जो उत्तरकाशी के अलग अलग जगहों पर ब्लैक संडे को हुई घटना में ज़ख्मी हो गए थे।

इस दिल दहला देने वाली घटना से जहां शासन और स्थानीय प्रशासन की तैयारियों की कलई खोल दी वही ये भी बता दिया कि गाड़ गदेरों और नदियों के मुहाने पर बसने की ज़िद इंसान को कितनी भारी पड़ सकती है।सवाल ये उठता है कि जिस आपदा ने चंद घंटों के तांडव में दो हज़ार परिवारों के दस हज़ार सदस्यों की जान सांसत में डाल दी आखिर उस मंज़र के बीत जाने के बाद हमने क्या कोई सबक लिया
, ये बात भी सच है कि सरकारी विभाग के सभी अफसरों ने खुद मशक्कत की मंत्रियों विधायकों और मुख्यमंत्री ने भी आपदाग्रस्त इलाके में कैम्प भी किया और हालात सुधारने के लिए हम मुमकिन कोशिशें की लेकिन क्या भविष्य में ऐसी घटनाओं पर रोक लग सकेगी ?
चलिए ये भी मान लेते हैं कि पहाड़ की ज़िंदगी खतरों के साथ ही शुरू होती है पहाड़ के मुश्किल भरे रास्तों पर राहत पहुंचाना लोहे के चने चबाने जैसा है क्योंकि रेस्क्यू ऑपरेशन में जुटे एक हेलीकॉप्टर का दर्दनाक हादसा सामने आया उसने उत्तराखंड सरकार और स्थानीय लोगों की पीड़ा को और ज्यादा बढ़ा दिया। आराकोट के तमाम इलाकों में सेब की बागबानी और तैयार पेटियों में रखे करोड़ों के सेब मलबों में तब्दील हो गए।जिन काश्तकारों की छोटी छोटी खेती थी या जिनकी रोजीरोटी किसी छोटी सी दुकान से चलती थी आज वहां सिर्फ मलबों का ढेर दिखाई दे रहा है।कुछ समय बीतेगा और ब्लैक संडे की ये घटना एक बार फिर सिलसिले की एक और कड़ी बनकर रह जायेगी। ज़रूरत है कि हर बार की तरह सिर्फ वक्ती विलाप और खानापूर्ति के लिए दावे न हों बल्कि उत्तराखंड में पहाड़ों के जन जीवन को बारहों महीने सुरक्षित बनाये रखने के लिए फूलप्रूफ मास्टर प्लान हो। स्थानीय जनता भी अतिक्रमण के नाम पर नदियों गदेरों और जंगलों का सीना छलनी करना बंद करे।वरना पहाड़ अपने रौद्र रूप से ऎसे ही कहर बरपाता रहेगा ।

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